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भारत में मातृ मृत्यु दर में बड़ी गिरावट, 23 साल में 384 से घटकर 88 हुई, लेकिन एनीमिया बना बड़ी चुनौती

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भारत में मातृ मृत्यु दर 2000 में 384 से घटकर 2023 में 88 हो गई है। लैंसेट स्टडी के अनुसार एनीमिया अब भी बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है।

भारत में मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछले दो दशकों में एक बड़ी और सकारात्मक उपलब्धि दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट ऑब्स्टेट्रिक्स, गायनाकोलॉजी एंड वीमेन हेल्थ’ में प्रकाशित एक ताजा अध्ययन के अनुसार, देश में मातृ मृत्यु दर वर्ष 2000 में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर 384 थी, जो 2023 में घटकर 88 रह गई है। यह गिरावट वैश्विक स्तर पर सबसे तेज सुधारों में से एक मानी जा रही है।

इस उपलब्धि को भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था, सरकारी योजनाओं और प्रसव सेवाओं में सुधार का परिणाम माना जा रहा है। सुरक्षित मातृत्व कार्यक्रमों, संस्थागत प्रसव में वृद्धि और ग्रामीण क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच ने इस सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

हालांकि इस प्रगति के बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि चुनौतियां अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। विशेष रूप से एनीमिया जैसी समस्या भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बनी हुई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के अनुसार, 15 से 49 वर्ष की उम्र की लगभग 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं, जो पिछली रिपोर्ट की तुलना में अधिक है।

विशेषज्ञों के अनुसार एनीमिया गर्भावस्था के दौरान कई जटिलताओं का कारण बन सकता है, जैसे अत्यधिक रक्तस्राव, संक्रमण का खतरा और समय से पहले प्रसव। यही कारण है कि इसे मातृ मृत्यु के प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल किया जाता है।

हेल्थ एक्सपर्ट बताते हैं कि आयरन की कमी अचानक नहीं होती, बल्कि लंबे समय तक पोषण की कमी, असंतुलित आहार और मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्तस्राव जैसे कारणों से धीरे-धीरे विकसित होती है। इसी वजह से महिलाओं के लिए जीवन-चक्र आधारित स्वास्थ्य देखभाल को बेहद जरूरी माना जाता है।

सरकारी स्तर पर आयरन और फोलिक एसिड सप्लीमेंट्स उपलब्ध कराए जा रहे हैं, लेकिन कई मामलों में नियमित सेवन और सही समय पर पहुंच अब भी एक चुनौती बनी हुई है। हल्के और मध्यम एनीमिया के मामलों में आयरन टैबलेट्स को प्राथमिक उपचार माना जाता है, जबकि गंभीर मामलों में IV-आयरन थेरेपी जैसे विकल्प उपयोगी साबित हो रहे हैं।

विशेष रूप से गर्भावस्था के अंतिम चरण में गंभीर एनीमिया के मामलों में यह उपचार जीवन रक्षक साबित हो सकता है।

भारत में मातृ मृत्यु का एक प्रमुख कारण पोस्टपार्टम हेमरेज यानी प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव भी है। विशेषज्ञों के अनुसार, सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में इस समस्या को कम करने के लिए नए मेडिकल मॉडल और प्रोटोकॉल लागू किए जा रहे हैं, जिनसे कई जगहों पर सकारात्मक परिणाम मिले हैं।

लैंसेट स्टडी में यह भी संकेत दिया गया है कि यदि एनीमिया और प्रसव संबंधी जटिलताओं पर और अधिक ध्यान दिया जाए, तो भारत मातृ मृत्यु दर को और भी कम कर सकता है।

कुल मिलाकर, भारत ने मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ी प्रगति हासिल की है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस उपलब्धि को बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास, पोषण सुधार और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना बेहद जरूरी है।

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